Episode 2: Repeal के बाद भी सुरक्षित अधिकार
April 04, 2026
पिछले भाग (Episode 1) में हमने आयकर अधिनियम, 2025 के उद्देश्यों और आवश्यकता को समझा था।

इस भाग में हम उस सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर देंगे जो हर करदाता और विधि-विशेषज्ञ के मन में है:

नए कानून के लागू होने के बाद पुराने Assessments और Pending Cases का क्या होगा?

1. कानूनी निरंतरता का सिद्धांत (The Doctrine of Saving)

नए अधिनियम के लागू होने का अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि पुराना वैधानिक इतिहास समाप्त हो गया है।

General Clauses Act, 1897 की धारा 6 यहाँ एक अभेद्य सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करती है।
Effect of repeal.—Where this Act, or any
[Central Act] or Regulation made after the
commencement of this Act, repeals any enactment hitherto made or hereafter to be made, then, unless a
different intention appears, the repeal shall not--
(a) revive anything not in force or existing at the time at which the repeal takes effect; or
(b) affect the previous operation of any enactment so repealed or anything duly done or suffered
thereunder; or
(c) affect any right, privilege, obligation or liability acquired, accrued or incurred under any
enactment so repealed; or
(d) affect any penalty, forfeiture or punishment incurred in respect of any offence committed
against any enactment so repealed; or
(e) affect any investigation, legal proceeding or remedy in respect of any such right, privilege,
obligation, liability, penalty, forfeiture or punishment as aforesaid;
and any such investigation, legal proceeding or remedy may be instituted, continued or enforced, and any
such penalty, forfeiture or punishment may be imposed as if the repealing Act or Regulation had not been
passed.

यह सब आयकर अधिनियम, 2025 की धारा 536 में विस्तार से उल्लिखित है। इस धारा के Sub-section (2) में स्पष्ट कहा गया है कि नए कानून के लागू होने के बावजूद 1 अप्रैल 2026 से पहले के कर वर्षों से संबंधित सभी अधिकार, दायित्व, आकलन, अपीलें और कार्यवाहियाँ आयकर अधिनियम, 1961 के अनुसार ही चलेंगी।

वैधानिक सूत्र:
जब तक कोई विपरीत मंशा व्यक्त न की जाए, किसी अधिनियम का निरसन (Repeal) पुराने कानून के तहत अर्जित अधिकारों, विशेषाधिकारों या उत्पन्न हुई देनदारियों को प्रभावित नहीं करता।

व्यवहारिक प्रभाव:

निर्धारित तिथि (Cut-off Date): 1 अप्रैल 2026 से पहले के सभी कर वर्ष आयकर अधिनियम, 1961 के प्रावधानों द्वारा ही शासित होंगे।

अधिकारों का संरक्षण: पुराने अधिनियम के अंतर्गत ली गई कटौतियाँ (Deductions), छूट (Exemptions) तथा लगाए गए दंड (Penalties) पूर्णतः वैध और प्रभावी बने रहेंगे।

2. लंबित मामलों (Pending Cases) पर प्रभाव

एक सामान्य आशंका यह होती है कि क्या नए कानून के लागू होने से पुराने मामले पुनः प्रारंभ हो जाएंगे।

इसका स्पष्ट उत्तर है — बिल्कुल नहीं।

कार्यवाही का पूर्ण संरक्षण:

CIT(A), ITAT, उच्च न्यायालय तथा उच्चतम न्यायालय में लंबित सभी अपीलें और वाद उसी कानून के अंतर्गत आगे बढ़ेंगे जिसके अंतर्गत वे प्रारंभ हुए थे।

कर निर्धारण और वैधानिक व्याख्या वही रहेगी जो आय अर्जित करने के समय प्रभावी थी।

यह व्यवस्था न्यायिक स्थिरता (Judicial Certainty) सुनिश्चित करती है, जो किसी भी सुदृढ़ विधिक प्रणाली की आधारशिला है।

3. विधिक प्रक्रिया और आधुनिक ढांचा (Procedural Evolution)

आयकर अधिनियम, 2025 केवल विधिक प्रावधानों का पुनर्गठन नहीं है, बल्कि यह कर प्रशासन की कार्यप्रणाली को आधुनिक बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

जहाँ अधिकार और देयताएं (Substantive Law) पूर्णतः सुरक्षित रहेंगी, वहीं प्रक्रिया (Procedural Law) को अधिक सरल, तीव्र और पारदर्शी बनाया जाएगा।

आधुनिकरण के प्रमुख तत्व:

एकीकृत डेटा प्रणाली — Real-time डेटा प्रोसेसिंग के माध्यम से असेसमेंट और रिफंड की प्रक्रिया अधिक तीव्र और सटीक होगी।

पारदर्शिता — विभाग और करदाता के बीच संचार को अधिक स्पष्ट और सुव्यवस्थित किया गया है।

अनुपालन में सरलता (Ease of Compliance) — मानवीय हस्तक्षेप में कमी तथा डिजिटल प्रणाली के माध्यम से अनुपालन को सहज बनाया गया है।

निष्कर्ष
आयकर अधिनियम, 2025 एक संतुलित और विचारशील सुधार है, जिसमें प्रक्रिया को आधुनिक बनाया गया है, परंतु करदाताओं के मौलिक अधिकारों को पूर्ण सुरक्षा प्रदान की गई है।

General Clauses Act, 1897 की धारा 6 यह सुनिश्चित करती है कि पुराने कानून के अंतर्गत उत्पन्न सभी अधिकार और दायित्व सुरक्षित रहें।

अतः यह परिवर्तन किसी प्रकार का व्यवधान नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित और न्यायसंगत संक्रमण है।

अवनीश कुमार
अधिवक्ता, उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालय
मो. 9990960545

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